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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
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जनमेजय़ उवाच
उत्तङ्कः केन तपसा संय़ुक्तः सुमहातपाः |  १   क
यः शापं दातुकामोऽभूद्विष्णवे प्रभविष्णवे ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति