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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
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वैशम्पाय़न उवाच
गौतमस्त्वव्रवीद्विप्रमुत्तङ्कं प्रीतमानसः |  १४   क
कस्मात्तात तवाद्येह शोकोत्तरमिदं मनः |  १४   ख
स स्वैरं व्रूहि विप्रर्षे श्रोतुमिच्छामि ते वचः ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति