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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
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उत्तङ्क उवाच
भवद्गतेन मनसा भवत्प्रिय़चिकीर्षय़ा |  १५   क
भवद्भक्तिगतेनेह भवद्भावानुगेन च ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति