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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
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उत्तङ्क उवाच
जरेय़ं नाववुद्धा मे नाभिज्ञातं सुखं च मे |  १६   क
शतवर्षोषितं हि त्वं न मामभ्यनुजानथाः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति