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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
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गौतम उवाच
किं त्वद्य यदि ते श्रद्धा गमनं प्रति भार्गव |  १९   क
अनुज्ञां गृह्य मत्तस्त्वं गृहान्गच्छस्व मा चिरम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति