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वन पर्व
अध्याय १९
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वासुदेव उवाच
नातिदूरापय़ाते तु रथे रथवरप्रणुत् |  ४   क
धनुर्गृहीत्वा यन्तारं लव्धसञ्ज्ञोऽव्रवीदिदम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति