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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
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गौतम उवाच
दक्षिणा परितोषो वै गुरूणां सद्भिरुच्यते |  २१   क
तव ह्याचरतो व्रह्मंस्तुष्टोऽहं वै न संशय़ः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति