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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
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अहल्यो उवाच
स तथेति प्रतिश्रुत्य जगाम जनमेजय़ |  ३०   क
गुरुपत्नीप्रिय़ार्थं वै ते समानय़ितुं तदा ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति