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सभा पर्व
अध्याय ५५
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विदुर उवाच
सर्वज्ञः सर्वभावज्ञः सर्वशत्रुभय़ङ्करः |  ११   क
इति स्म भाषते काव्यो जम्भत्यागे महासुरान् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति