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सभा पर्व
अध्याय ५५
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विदुर उवाच
समवेतान्हि कः पार्थान्प्रतिय़ुध्येत भारत |  १७   क
मरुद्भिः सहितो राजन्नपि साक्षान्मरुत्पतिः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति