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सभा पर्व
अध्याय ५५
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विदुर उवाच
गृहे वसन्तं गोमाय़ुं त्वं वै मत्वा न वुध्यसे |  ३   क
दुर्योधनस्य रूपेण शृणु काव्यां गिरं मम ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति