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वन पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
वादित्रं देवविहितं नृलोके यन्न विद्यते |  ७   क
तदर्जय़स्व कौन्तेय़ श्रेय़ो वै ते भविष्यति ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति