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वन पर्व
अध्याय ५५
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वृहदश्व उवाच
कृच्छ्रे स नरके मज्जेदगाधे विपुलेऽप्लवे |  ११   क
एवमुक्त्वा कलिं देवा द्वापरं च दिवं यय़ुः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति