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विराट पर्व
अध्याय ५५
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वैशम्पाय़न उवाच
उत्पेतुः शरजालानि घोररूपाणि सर्वशः |  १७   क
अविध्यदश्वान्वाह्वोश्च हस्तावापं पृथक्पृथक् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति