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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
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वैशम्पाय़न उवाच
जिज्ञासुस्तमृषिश्रेष्ठं किं कुर्याद्विप्रिय़े कृते |  ५   क
इति सञ्चिन्त्य दुर्मेधा धर्षय़ामास तत्पय़ः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति