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वन पर्व
अध्याय १८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
भूय़ एव तु माहात्म्यं व्राह्मणानां निवोध मे |  १   क
वैन्यो नामेह राजर्षिरश्वमेधाय़ दीक्षितः |  १   ख
तमत्रिर्गन्तुमारेभे वित्तार्थमिति नः श्रुतम् ||  १   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति