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वन पर्व
अध्याय १९९
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मार्कण्डेय़ उवाच
ओषध्यो वीरुधश्चापि पशवो मृगपक्षिणः |  ५   क
अन्नाद्यभूता लोकस्य इत्यपि श्रूय़ते श्रुतिः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति