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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
स तानभीषून्पुनराददानः; प्रगृह्य शङ्खं द्विषतां निहन्ता |  १०२   क
विनादय़ामास ततो दिशश्च; स पाञ्चजन्यस्य रवेण शौरिः ||  १०२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति