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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
व्याविद्धनिष्काङ्गदकुण्डलं तं; रजोविकीर्णाञ्चितपक्ष्मनेत्रम् |  १०३   क
विशुद्धदंष्ट्रं प्रगृहीतशङ्खं; विचुक्रुशुः प्रेक्ष्य कुरुप्रवीराः ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति