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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु तं चिन्तय़तां सिताश्व; मस्त्रार्थिनं वासवमभ्युपेतम् |  १६   क
मासोऽथ कृच्छ्रेण तदा व्यतीत; स्तस्मिन्नगे भारत भारतानाम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति