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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
ततो दिशश्चानुदिशश्च पार्थः; शरैः सुधारैर्निशितैर्वितत्य |  ११३   क
गाण्डीवशव्देन मनांसि तेषां; किरीटमाली व्यथय़ां चकार ||  ११३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति