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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा घोरतमे प्रवृत्ते; शङ्खस्वना दुन्दुभिनिस्वनाश्च |  ११४   क
अन्तर्हिता गाण्डिवनिस्वनेन; भभूवुरुग्राश्च रणप्रणादाः ||  ११४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति