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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
आधावाभ्येहि मा गच्छ किं भीतोऽसि क्व यास्यसि |  १८   क
स्थितोऽहं समरे मा भैरिति चान्ये विचुक्रुशुः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति