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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
उदीच्यां चैनमालोक्य दक्षिणस्यां पुनः प्रभो |  २४   क
एवं स समरे वीरो गाङ्गेय़ः प्रत्यदृश्यत ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति