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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
न चैनं पाण्डवेय़ानां कश्चिच्छक्नोति वीक्षितुम् |  २५   क
विशिखानेव पश्यन्ति भीष्मचापच्युतान्वहून् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति