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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
कुर्वाणं समरे कर्म सूदय़ानं च वाहिनीम् |  २६   क
व्याक्रोशन्त रणे तत्र वीरा वहुविधं वहु |  २६   ख
अमानुषेण रूपेण चरन्तं पितरं तव ||  २६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति