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वन पर्व
अध्याय ८५
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वैशम्पाय़न उवाच
अत्यन्यान्पर्वतान्राजन्पुण्यो गिरिवरः शिवः |  १६   क
महेन्द्रो नाम कौरव्य भार्गवस्य महात्मनः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति