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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा हि समरे भीष्मं व्यात्ताननमिवान्तकम् |  ४५   क
भय़ार्ताः सम्प्रणश्यन्ति सिंहं क्षुद्रमृगा इव ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति