वन पर्व  अध्याय १८

वासुदेव उवाच

तस्य वर्म विभिद्याशु स वाणो मत्सुतेरितः |  १७   क
विभेद हृदय़ं पत्री स पपात मुमोह च ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति