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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
अमृष्यमाणः स ततो महात्मा; यशस्विनं सर्वदशार्हभर्ता |  ८१   क
उवाच शैनेय़मभिप्रशंस; न्दृष्ट्वा कुरूनापततः समन्तात् ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति