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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
सङ्कम्पय़न्गां चरणैर्महात्मा; वेगेन कृष्णः प्रससार भीष्मम् |  ८७   क
मदान्धमाजौ समुदीर्णदर्पः; सिंहो जिघांसन्निव वारणेन्द्रम् ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति