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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
सोऽभ्यद्रवद्भीष्ममनीकमध्ये; क्रुद्धो महेन्द्रावरजः प्रमाथी |  ८८   क
व्यालम्विपीतान्तपटश्चकाशे; घनो यथा खेऽचिरभापिनद्धः ||  ८८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति