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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
पतितान्युत्तमाङ्गानि वाहवश्च विभूषिताः |  ९   क
व्यचेष्टन्त महीं प्राप्य शतशोऽथ सहस्रशः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति