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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
तमात्तचक्रं प्रणदन्तमुच्चैः; क्रुद्धं महेन्द्रावरजं समीक्ष्य |  ९१   क
सर्वाणि भूतानि भृशं विनेदुः; क्षय़ं कुरूणामिति चिन्तय़ित्वा ||  ९१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति