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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
स वासुदेवः प्रगृहीतचक्रः; संवर्तय़िष्यन्निव जीवलोकम् |  ९२   क
अभ्युत्पतँल्लोकगुरुर्वभासे; भूतानि धक्ष्यन्निव कालवह्निः ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति