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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
तमापतन्तं प्रगृहीतचक्रं; समीक्ष्य देवं द्विपदां वरिष्ठम् |  ९३   क
असम्भ्रमात्कार्मुकवाणपाणी; रथे स्थितः शान्तनवोऽभ्युवाच ||  ९३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति