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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा हतस्येह ममाद्य कृष्ण; श्रेय़ः परस्मिन्निह चैव लोके |  ९५   क
सम्भावितोऽस्म्यन्धकवृष्णिनाथ; लोकैस्त्रिभिर्वीर तवाभिय़ानात् ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति