भीष्म पर्व  अध्याय ५५

सञ्जय़ उवाच

पार्थस्तु विष्टभ्य वलेन पादौ; भीष्मान्तिकं तूर्णमभिद्रवन्तम् |  ९८   क
वलान्निजग्राह किरीटमाली; पदेऽथ राजन्दशमे कथञ्चित् ||  ९८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति