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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
अवस्थितं च प्रणिपत्य कृष्णं; प्रीतोऽर्जुनः काञ्चनचित्रमाली |  ९९   क
उवाच कोपं प्रतिसंहरेति; गतिर्भवान्केशव पाण्डवानाम् ||  ९९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति