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द्रोण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
स्वस्रीय़ं वासुदेवस्य पुत्रं गाण्डीवधन्वनः |  १५   क
कथं त्वा विरथं वीरं द्रक्ष्याम्यन्यैर्निपातितम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति