सभा पर्व  अध्याय ६२

द्रौपद्यु उवाच

स्वय़ंवरे यास्मि नृपैर्दृष्टा रङ्गे समागतैः |  ४   क
न दृष्टपूर्वा चान्यत्र साहमद्य सभां गता ||  ४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति