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द्रोण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
ऋतुकाले स्वकां पत्नीं गच्छतां या मनस्विनाम् |  २८   क
न चान्यदारसेवीनां तां गतिं व्रज पुत्रक ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति