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द्रोण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
कथमिन्दीवरश्यामं सुदंष्ट्रं चारुलोचनम् |  ३   क
मुखं ते दृश्यते वत्स गुण्ठितं रणरेणुना ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति