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द्रोण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
ह्रीमन्तः सर्वशास्त्रज्ञा ज्ञानतृप्ता जितेन्द्रिय़ाः |  ३१   क
यां गतिं साधवो यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति