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द्रोण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
ताः प्रकामं रुदित्वा च विलप्य च सुदुःखिताः |  ३३   क
उन्मत्तवत्तदा राजन्विसञ्ज्ञा न्यपतन्क्षितौ ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति