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द्रोण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
विसञ्ज्ञकल्पां रुदतीमपविद्धां प्रवेपतीम् |  ३५   क
भगिनीं पुण्डरीकाक्ष इदं वचनमव्रवीत् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति