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द्रोण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
योऽन्वास्यत पुरा वीरो वरस्त्रीभिर्महाभुजः |  ७   क
कथमन्वास्यते सोऽद्य शिवाभिः पतितो मृधे ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति