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कर्ण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
तत्राभिद्रवतां पार्थमारावः सुमहानभूत् |  १२   क
सागरस्येव मत्तस्य यथा स्यात्सलिलस्वनः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति