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कर्ण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
ते वध्यमानाः समरे नानालिङ्गैः शितैः शरैः |  १९   क
अर्जुनं समभित्यज्य दुद्रुवुर्वै दिशो भय़ात् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति