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कर्ण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
आय़ान्तमश्वैर्हिमशङ्खवर्णैः; सुवर्णमुक्तामणिजालनद्धैः |  ३   क
जम्भं जिघांसुं प्रगृहीतवज्रं; जय़ाय़ देवेन्द्रमिवोग्रमन्युम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति